ग्लोबल लेवल पर बढ़ता हुआ फूड प्राइस
ग्लोबल फूड प्राइस क्राइसिस
किसी भी देश में यदि साल दर साल वहां के खाद्य पदार्थों में वृद्धि हो रही है तो उसको टैकल कर सकता है .
मान लीजिए इंडिया में पिछले साल जून में खाद्य ऑयल 1 लीटर के दाम से ₹200 और इस समय जून २०२२ में ₹210 हो जाता है। तो यह कोई बहुत बड़ी बात नहीं होती है इसको कोई भी देश है टैकल कर सकता है।
डोमेस्टिक पॉलिसी की सहायता से जैसे कि वह खाद्य तेल के प्रोडक्शन को बढ़ा सकता है या फिर बाहर से इंपोर्ट करके।
वैश्विक स्तर पर जो फूड प्राइसेज बढ़ रहा है उसका रिप्र्कशन मतलब प्रभाव या फिर असर क्या-क्या पड़ता है
💐 इंडिया जो वस्तुएं बाहर से मंगा रहा था उसके दाम बढ़ गए इससे भारत अपना इंपोर्ट कम कर देगा .
💐इससे खाद्य तेल हमारे देश में कम आने वाला है दो देशों के बीच में होने वाला व्यापार रुक जाएगा.
💐भूखमरी बढ़ जाएगी.
💐 बहुत सारा विदेशी मुद्रा भंडार खाद्य पदार्थों को आयात करने में खर्च हो जाता है.
💐किसी भी देश के फिस्कल व्यय पर बहुत बुरा असर पड़ता है .
💐इससे फिस्कल डेफिसिट और ज्यादा बढ़ जाता है देश में अनरेस्ट की कंडीशन बन जाती है धरना प्रदर्शन होना दंगे होना .
ग्लोबल फूड प्राइस बढ़ने का रीजन क्या है
इसका कारण केवल खाद्य पदार्थों का कम उत्पादन होना अकेला नहीं है। इसके कई सारे कारण हो सकते हैं।
पिछले कुछ सालों में जो फूड क्राइसिस आए हैं 1973 से लेकर के 1976 तक पहला झटका आया था। इस दौरान खाद्य पदार्थों के दाम में बहुत ज्यादा बढ़ोतरी हुई थी।
लेकिन 1976 के बाद से फिर खाद्य पदार्थों के दाम में गिरावट आने लगी।
2002 में खाद्य पदार्थों के दाम काफी कम हो गए थे।
दूसरी बार ग्लोबल फूड क्राइसिस 2008 में आया था। और 2011 में यह एकदम पीक पर था इसके बाद 2014 के बाद से फूड प्राइसेज के दाम गिरना चालू हो गए।
लेकिन 2006 से पहले जो दाम हुआ करते थे वही कंडीशन अभी तक कभी नहीं आई. 2015 से लेकर के 2019 तक खाद पदार्थों के दाम स्थिर रहे लेकिन 2020 के तीसरे क्वार्टर में वैश्विक स्तर पर दाम फिर से बढ़ना चालू हो गए।
इसका कारण हमें लगता है कि कोरोनावायरस के चलते चलते ऐसा हुआ।
दूसरा
रसिया और यूक्रेन का युद्ध रहा है जिसके चलते चलते खाद्य पदार्थों में वृद्धि देखी गई। यह दो प्रमुख कारण थे बड़े-बड़े।
इसके अलावा कुछ छोटे-छोटे कारण भी हैं जिन पर ध्यान देना जरूरी है -
- आज के समय में खाद्य पदार्थों का इस्तेमाल बायोफ्यूल के उत्पादन के लिए किया जाने लगा है. जैसे गन्ने से एथेनॉल बनाना। 2003 में वेजिटेबल ऑयल का एक परसेंट इस्तेमाल किया जाता था बायोडीजल के रूप में। जो कि बढ़कर के 2011 में 11 परसेंट हो गया है और 2021 में यह 15 परसेंट हो गया .
- जब कभी किसी देश में कच्चे तेल के दाम बढ़ने लग जाते हैं जैसे पेट्रोल ,डीजल। उस समय में वहां की सरकार ऑयल सीड और ग्रेन का उपयोग करती है बायोडीजल के रूप में , एथेनॉल के रूप में। इससे भी खाद्य पदार्थों में कमी आ जाती है।
- क्लाइमेट चेंज के चलते चलते आजकल सरकार है पेट्रोल डीजल के उपयोग को कम कर रही हैं और उनमें ब्लैंडिट एथेनॉल का यूज करने लगी है और एथेनाल बनाने के लिए गन्ने का उपयोग किया जाता है। इस प्रकार से हम खाद्य पदार्थ का यूज़ बायोफ्यूल के रूप में करना चालू कर देते हैं '
- फ़र्टिलाइज़र के दाम में वृद्धि होना इसके अलावा अन्य जो एग्रोकेमिकल किसान यूज करते हैं उनके दाम में वृद्धि हो जाती है तो किसान भी अपनी फसलों को महंगा बेचते है ;
एग्जांपल के तौर
पर यदि देखें तो अप्रैल 2021 से अप्रैल 2022 के बीच में फ़र्टिलाइज़र के दाम में 150% की वृद्धि हुई थी 'इंटरनेशनल कीमत में।
मतलब 50 किलो का उसमें कम से कम 1000 से लेकर के ₹3000 की वृद्धि हुई है पिछले 15 महीने में.
सरकारों के द्वारा क्या क्या प्रयास किए जाने चाहिए
- सरकार को इंपोर्ट को आसान बनाना होगा।
क्योंकि सरकार को ज्यादा खतरा नहीं है वैसे भी दाम ज्यादा है जिसको खरीदना है खरीद लो। क्योंकि अभी हम इंपोर्ट को बढ़ा देते हैं तो हमारे देश में चीजों की अधिकता हो जाएगी अधिकता होने से फिर उनके दामों में गिरावट होने लगेगी।
- सरकार को अपने निर्यात पर कंट्रोल करना चाहिए ताकि अपने देश में खाद्य पदार्थों की कमी ना जाए जैसे कि सरकार ने किया भी था।
भारत में जब अपने गेहूं के निर्यात को बैन किया था उस समय भारत के ऊपर यह आरोप लगाया जाता था कि भारत के ऊपर भरोसा नहीं किया जा सकता है खाद्य पदार्थों के आयात को लेकर के .
भारत ने ऐसे समय में बैन लगाया था जब पूरे विश्व में गेहूं की कमी है और उसके दाम बढ़ रहे हैं .
लेकिन लेखक इस बात का बचाव करते हैं उनका कहना है कि भारत ने अपने निर्यात में छेड़छाड़ नहीं की है 2015-16 से लेकर के 2020 में भारत का गेहूं का निर्यात था वह .1से लेकर के 1 परसेंट के बीच में था .
जब भारत में इस लिमिट से ज्यादा गेहूं का निर्यात होने लगा था तो सरकार ने इस लिमिट पर रोक लगा दी थी कि हम दशमलव 1 परसेंट से एक परसेंट तक ही निर्यात करेंगे गेहूं का।
भारत की बफर स्टॉक की जो पॉलिसी है उसने काफी मदद किया है ग्लोबल प्राइस यदि पड़ता है उस को कंट्रोल करने
चिंता वाली बात यह है 1970 के दशक में ग्रीन रिवॉल्यूशन टेक्नोलॉजी भारत में आई थी इसी कारण से 1973 से 1976 के बीच में जो फूड क्राइसिस आया था उसको अच्छे से हम टैकल कर पाए थे परंतु हाल के समय में देखा जाए तो इस प्रकार की कोई टेक्नोलॉजी नहीं आई है जिससे कि हम फूड प्रोडक्शन को एकदम से बढ़ा सकें
लेखक की तरफ से सुझाव दिया जाता है कि हमें रिसर्च एंड डेवलपमेंट पर कृषि के क्षेत्र में ध्यान देने की जरूरत है ।
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