पेरारिवलन की रिहाई का डिसीजन गलत कैसे हैं
गवर्नर की पार्डन करने की पावर को लेकर के एक सुप्रीम कोर्ट का जजमेंट आया था उसी से रिलेटेड है आर्टिकल है
सुप्रीम कोर्ट का जजमेंट आया है वह आखिर गलत क्यों है इस बात को यहां पर बताया गया पेरारिवलन जिनके ऊपर पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या का आरोप लगाया गया था सबसे पहले तो इनको मौत की सजा सुनाई गई फिर बाद में इन को उम्र कैद की सजा दी गई हाल ही ने सुप्रीम कोर्ट में इन को रिहा कर दिया गया है आर्टिकल 142 का इस्तेमाल करके सुप्रीम कोर्ट का यह आर्डर संविधान का उल्लंघन करता है
आर्टिकल 161 में राज्यपाल को यह पावर दी गई है कि वह किसी भी कैदी या अपराधी को पार्डन कर सकता है
Suspension
सजा को कुछ टाइम के लिए रोक देना ताकि वह अपील कर सकें
कमुसन
मृत्यु को उम्र कैद में बदल देना
रिमी सेन
इसमें सजा को 4 साल की बजाय 2 साल कर दिया जाता है
राजपाल की सारी शक्तियां वहीं पर लागू होती है जब कोई अपराध वहां किस राज्य से संबंधित है
या फिर स्टेट की एग्जीक्यूटिव पावर एक्सटेंड होती हो जहां पर स्टेट का कानून लागू हो रहा है केवल वही तक राज्यपाल को पावर है वह किसी कैदी को पार्डन दे सकता है
जहां पर केंद्र सरकार से संबंधित कानून आ जाते हैं वहां पर वार्डन की पावर राष्ट्रपति के पास में चले जाती है
यहां पर ध्यान देने वाली बात यह है राज्यपाल और राष्ट्रपति दोनों के पास पार्डन की पावर है लेकिन वह कौंसिल ऑफ मिनिस्टर की एड एंड एडवाइज से काम करते हैं इसका मतलब यह है यदि तमिलनाडु की विधानसभा कानून बनाकर के राज्यपाल को कहती है कि आप इनको वार्डन कर दीजिए हो सकता है राज्यपाल पहली बार में सहमत ना हो फाइल को वापस कर दे लेकिन यदि दूसरी बार सरकार किसी फाइल को वापस राज्यपाल के पास भेजती है तो राज्यपाल के पास कोई ऑप्शन नहीं बचता है लेकिन यहां प्रॉब्लम यह जाती है कि संविधान में यहां पर कोई टाइमलाइन निर्धारित नहीं की गई है कि राज्यपाल कितने समय तक फाइल को अपने पास में रख सकता है तमिलनाडु की सरकार का आरोप है कि हमने अपनी फाइल को राज्यपाल के पास भेजा था 2 साल हो चुके हैं राज्यपाल ने अपना कोई भी डिसीजन नहीं दिया है 2 साल इंतजार करने के बाद राज्यपाल ने इस फाइल को राष्ट्रपति के पास भेज दिया इसके बाद केस पहुंच जाता सीधे सुप्रीम कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार के वकील सॉलिसिटर जनरल से बोला कि आपका इस देश से क्या लेना देना है यह मामला तो स्टेट गवर्नमेंट और राजपाल के बीच का है केंद्र सरकार की तरफ से बोला गया कि पार्डन की असली पावर राष्ट्रपति के पास में है तू सुप्रीम कोर्ट ने कहा इसका मतलब यह हुआ अभी तक राज्यपाल ने जितनी भी केस इसमें पार्डन दिया है वह सब गलत है उन सब को हम भूल जाएं और जितने भी नए केसिस आएंगे वह सारे केस राष्ट्रपति के जाएंगे और राष्ट्रपति सबको माफ करेगा लेकिन यह बात लेखक के अनुसार गलत है क्योंकि राज्यपाल की पावर वहीं पर है जहां तक कानून राज्य सरकार के दायरे में अब क्योंकि यहां पर नॉर्मल किसी व्यक्ति की हत्या नहीं हुई थी प्राइम मिनिस्टर की हत्या हुई थी जांच एजेंसी में शामिल थी इसलिए इसे हम राज्य सरकार का केस नहीं मान सकते इसमें बहुत सारे कानूनों का उल्लंघन हुआ है जैसे की लिस्ट देख सकते हैं
आर्म्स एक्ट 1959
पासपोर्ट एक्ट 1967
एक्सप्लोसिव सब्सटेंस एक्ट 1908
इन सारे कानूनों का उल्लंघन हुआ है इसलिए पार्डन की पावर राष्ट्रपति के पास होना चाहिए ना कि राज्यपाल के पास
सुप्रीम कोर्ट ने आर्टिकल 142 का प्रयोग किया है यह आर्टिकल सुप्रीम कोर्ट को बहुत ही पावरफुल बनाता है जिसके अंतर्गत जस्टिस को सिक्योर करने के लिए सुप्रीम कोर्ट किसी भी प्रकार का आर्डर जारी कर सकता है
लेकिन इस परिस्थिति में सुप्रीम कोर्ट को राज्यपाल को समय देना चाहिए था या राष्ट्रपति को समय देना चाहिए था कि आप इतने दिनों के भीतर में अपना निर्णय दीजिए जबकि आप कह रहे हो कि टाइम बहुत ज्यादा हो गया है इसलिए आप उनको रिहा कर दीजिए इसलिए यह बात गलत होती टाइम तो लगना ही था क्योंकि राज्यपाल इसको बहुत बारीकी से जांच कर रहे थे यदि बार-बार कोर्ट में पिटीशन डाल रहे थे
सितंबर 2018 में तमिलनाडु की सरकार ने राज्यपाल से कहा था कि आप इन को रिहा कर दीजिए ताकि जो तमिल सेंटीमेंट है उनकी रिस्पेक्ट किया जा सके लेकिन इसमें कैदी के सेंटीमेंट कहां चले गए फिर
1980 की जजमेंट में वीआर कृष्णा अय्यर ने एक बात कही थी हमारे कानून में एक कमी है जब हम कोई भी डिसीजन देते हैं तो उस टाइम में कैदी य फिर विक्टिम के परिवार को कंसीडर नहीं किया जाता है
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