land reform भूमि सुधार क्या है ?

Land reforms  भूमि सुधार 

Land reform is technical concept in agricultural which refers to changes brought about in the agrarian structure through direct intervention by the state . 
 सरकार के द्वारा सीधे तौर पर  खेती और भूमि से संबंधित सुधार है । 
 
Or 
It means improvement in in mutual relationship between the landlord, farmers and the government in relation to the land. 
सरकार और किसानों के बीच म्यूचुल रिलेशनशिप को इम्प्रूवमेंट करने की प्रकिया है । 


इसके अंतर्गत सरकार द्वारा निम्न कदम उठाए गए : - 

1. abolition of intermediaries 
मध्यस्थों की समाप्ति

इसमें जमींदारी, रैयतवाड़ी, महालवारी को समाप्त कर दिया गया ।
In India there existed a large Army of middleman like Zamindar, mahalwar ryotwar. 

 who collected rent from actual cultivators and deposited a part of it to the government as land revenue .

They treated cultivator as slaves. 

after independence the abolition of intermediaries was given great importance as a result of intermediary evolution common land such as forest ,waste land etc .

which belong to the intermediaries was passed on the state government nearly 20 million tenants have been brought into direct relationship with the state 

and around 173 million acres of land has been taken away from the intermediaries and given away to land less cultivator .

the Zamindar were pad compensation for the land .

like away from them by government the ryotwari system was developed instead of zamindari system

2 .Tenancy reforms  काश्तकारी सुधार 

1. Regulation of rent 
जमींदार कितना अधिकतम टैक्स वसूल कर सकते हैं इसको निश्चित कर दिया गया था अलग-अलग स्टेट में अलग-अलग थी। 
 यह दर एवरेज 35 से 40 परसेंट थी । 

2 . Security of tenure 
कल्टीवेशन को सिक्योरिटी प्रोवाइड करना किसानों को उसकी भूमि से इजेक्ट नहीं किया जा सकता बिना कानूनी प्रक्रिया ।
के यदि लैंड ओनर रिजर्व करता है लैंड को  सेल्फ या पर्सनल कल्टीवेशन के लिए  तो
किसान को  एक निर्धारित मात्रा में मिनिमम एरिया प्रोवाइड किया जाएगा खेती के लिए। 

 3 . Right of ownership
इसमें लेजिसलेशन के माध्यम से कानून पास किए गए जो कि किसानों को ओनरशिप के राइट दे देते हैं . 

कुछ कुछ राज्यों में किसान ऑनर्स बनाया गया और उनको कहा गया कि आप कंपनसेशन दीजिए पहले वाले ऑनर्स को लैंडलॉर्ड को सूटेबल इंस्टॉलमेंट के माध्यम से भी ।

 इसके अलावा किसानों को ऑप्शन दिया गया कि या तो वे टिनेंट्स मतलब किसान ही रहे या फिर भूमि के मालिक बन जाए ।

ऑनर्स इसके लिए उन्हें निर्धारित मात्रा में मिनिमम रकम सरकार को देना होगा इसके तहत लगभग 11 मिलियन किसान को  ओनरशिप मिली, 15 मिलियन एकड़ जमीन की ।

Reorganisation of agricultural 
इसमें ऐसे बदलाव लाए गए जिसके अंतर्गत कोई भी किसान कितने एरिया को होल्ड करके रख सकता है इसमें तीन पॉलिसी लागू की गई थी .
1 . लैंड को रीडिसटीब्यूट करना

 इसके लैंडहोल्डिंग्स में सीलिंग को इंपोज किया गया। 

 इसका मतलब यह है कि  मैक्सिमम कितनी जमीन  रख सकता है कोई भी किसान । 
  जो सरप्लस  लैंड रहेगा उसको गवर्नमेंट एक्वायर कर लेगी। 

 और इसको रेडिसटीब्यूट कर देगी लैंडलेस लेबरर्स और स्माल फार्मर को ।
इसके अलावा जो मिनिमम लिमिट थी वह सबको अवेलेबल होना चाहिए था उससे कम ना हो 1997 में गवर्नमेंट ने डिसटीब्यूट किया था 72 मिलियन एकड़ ऑफ लैंड भूमिहीन किसानों को ।

भूमि का कंसोलिडेशन  / इकठा करना / चकबन्दी
इसके अंतर्गत जमीन के फ्रेगमेंटेशन को खत्म करने का काम किया गया अब जो छोटी-छोटी इधर-उधर बिखरी हुई जमीन थी उसको ग्रुप किया गया आपस में सिंगल कंपैक्ट ब्लॉक के रूप में इसके अंतर्गत यदि किसी व्यक्ति की जमीन अलग-अलग जगह पर है तो उसको मिलाकर के इकट्ठा किया गया वन प्लॉट में चेंज किया गया यह काम चालू हुआ था पंजाब में 1921 में ।
और इसी समय में  कोऑपरेटिव सोसाइटी का निर्माण किया गया था कंसोलिडेशन के काम के लिए ।

इसके बाद कई सारे राज्यों के द्वारा कुछ लेजिसलेशन पास किए गए जो कंपलसरी करते थे कंसोलिडेशन को ।

लेकिन इतने प्रयास  के बावजूद भी हाफ सेंचुरी बीतने के बाद केवल 30% कल्टीवेटेड एरिया को ही कंसोलिडेटेड किया गया ।

 और ज्यादातर जो हिस्सा था वह पंजाब हरियाणा और उत्तर प्रदेश का था ।

यह निम्नलिखित कारणों से सफल नहीं हो पाया
1 ancestral पुश्तैनी land से जुड़ाव - 
और इसको वह एक्सचेंज नहीं करना चाहते थे कि किसी और की जमीन के साथ में
2 उतनी ही मात्रा में उसी क्वालिटी का लैंड एक्सचेंज मिलना मुश्किल होता था
3 ऑफिशियल consolidation मशीनरी बहुत स्लो थी और ज्यादातर करप्शन होते रहता था
4 गरीबों द्वारा इस को ज्यादा कोऑपरेट नहीं किया गया क्योंकि उनको डर था बड़े जो लैंडलॉर्ड हैं उनके प्रभाव में आकर के गवर्नमेंट के अधिकारी उनके साथ डिस्क्रिमिनेशन कर सकते हैं उनकी उपजाऊ जमीन ले लेंगे और उनको बंजर भूमि दे सकते हैं।

कॉपरेटिव खेती 
इसके अंतर्गत एक तरफ बहुत  से किसान मिलकर  खेती करते हैं  दूसरी तरफ उनके स्वामित्व के अधिकारों की रक्षा भी की जाती इसके । 

अंतर्गत गांव के रहने वाले किसान को ऑपरेटिव सोसाइटी का निर्माण करते हैं कल्टीवेशन के लिए जिनके पास छोटी-छोटी होल्डिंग्स है ।

 उनकी जमीन को इकट्ठा किया जाता था और खेती की जाती है  ताकि जो जमीन है उसकी यूनिट को बढ़ाया जा सके और आर्थिक रूप से फायदेमंद हो ।

सब की जमीन को पूल किया जाता था लेकिन सभी कल्टीवेटर के प्रॉपर्टी राइट जो है बने रहते थे इसके बाद भेजो प्रोड्यूसर उसको डिसटीब्यूट कर लिया जाता था ।
जमीन और लेबर , मशीनों का यहाँ प्रयोग किया जाता है  । खेती की जाने वाली जमीन के साइज को बढ़ाने के लिए लेकिन यह जो प्रोग्राम है वह बहुत ज्यादा सक्सेसफुल नहीं रहा था इंडिया में ।

भूमि सुधारों की असफलता

 भूमि सुधार कानून बने तो लेकिन इनको लागू करने में ढील बरती गई 1960 और 70 के दशक में सरकार ने कई प्रकार की कृषि सुधारों की शुरुआत की ।
भूमि के स्वामित्व मिलने से किसानों को उत्पादन बढ़ाने के लिए प्रोत्साहन में कतु बिचौलियों के उन्मूलन करके समानता के लक्ष्य की पूरी प्राप्ति नहीं हो पाई

1 कानून की कमियों का लाभ
 उठाकर के कुछ पुराने जमींदारों ने उस क्षेत्र में बहुत बड़े बड़े भूखंडों पर अपना स्वामित्व बनाए रखा  ।

कुछ मामलों में काश्तकारों को बेदखल कर दिया और भूमि स्वामियों ने अपने किसान भूस्वामी मतलब वास्तविक कृषक होने का दावा किया ।

 किसानों को भूमि का हक मिलने बाद भी निर्धन कृषि श्रमिकों - बटाईदार , भूमिहीन मजदूर को भूमि सुधारों से कोई लाभ नहीं मिला ।

2 अधिकतम भूमि सीमा निर्धारण कानून 

इसमें भी कई सारी बाधा आई ।बड़े जमींदारों ने इस कानून को कोर्ट में चुनौती दी जिसके कारण इसे लागू करने में देरी हुई ।

इसी दौरान भी अपनी भूमि निकट के संबंधियों के नाम में करा के कानून से बच गए ।

कानून में भी अनेक कमियां थी जिनके द्वारा बड़ी जमींदारों ने भूमि पर अधिकार बनाए रखने के लिए लाभ उठाया ।

केरल और पश्चिम बंगाल में काम अच्छा हुआ था जिससे किसानों को भूमि दी गई ।

 हरित क्रांति और श्वेत क्रांति 
 पैकेज टेक्नोलॉजी पर आधारित हरित क्रांति और श्वेत क्रांति जैसी कृषि सुधार कुछ रणनीति आरंभ की गई।
इसमें विकास कुछ क्षेत्रों तक सीमित रहा इसलिए 1980 और 1990 के दशक में व्यापक भूमि विकास कार्यक्रम प्रारंभ किए गए ।

फसल बीमा जैसे कि सूखा ,बाढ़, चक्रवात, आग और बीमारी के कारण फसल बीमा के प्रावधान किए गए ।

ब्याज - किसानों को कम दर पर ब्याज दिया गया इसके लिए ग्रामीण बैंक सहकारी समिति और बैंक स्थापित किए गए।

क्रेडिट कार्ड योजना - किसानों के लाभ के लिए भारत सरकार ने किसान क्रेडिट कार्ड योजना, व्यक्तिगत दुर्घटना बीमा योजना की शुरुआत की ।

मौसम की जानकारी - इसके अलावा किसानों को मौसम की जानकारी देखने के लिए आकाशवाणी दूरदर्शन और इसके अलावा कई सारे कृषि कार्यक्रम प्रसारित किए जाते हैं .

MSP - इसके अलावा किसानों को बिचौलियों और दलालों के शोषण से बचाने के लिए न्यूनतम सहायता मूल्य जिसको एमएसपी कहते हैं और भी कई सारे महत्वपूर्ण खरीद मूल्य की सरकार ने घोषणा की है ।

चिंता का बात

 जीडीपी में कृषि का योगदान घटते जा रहा है।
इसके अलावा भी सरकार ने कुछ प्रयास किए हैं ताकि 
🔘खेती को आधुनिक बनाया जा सके
🔘 भारतीय खेती में सुधार के लिए भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद और कृषि विश्वविद्यालय की स्थापना की गई 
🔘पशु चिकित्सा सेवाएं पशु प्रजनन केंद्र की स्थापना की गई
🔘 बागवानी विकास 
🔘मौसम विज्ञान और मौसम के पूर्वानुमान के क्षेत्र में अनुसंधान और विकास को वरीयता दी गई




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