हरित क्रांति green revolution
Green revolution / हरित क्रांति
आजादी के समय भारत की 75% जनसंख्या कृषि पर आश्रित थी ।
इस क्षेत्र में उत्पादन बहुत कम होता क्योंकि पुरानी प्रौद्योगिकियों का प्रयोग किया जाता था और ज्यादातर किसानों के पास बेसिक इन्फ्राट्रक्चर नहीं था कृषि मानसून पर निर्भर थी यदि मानसून कमाता तो किसानों को कठिनाई होती थी उनके पास सिंचाई की सुविधा नहीं होती और केवल कुछ किसानों के पास इस जाई के साधन मौजूद थे ।
हरित क्रांति का आगमन - यह कृषि उत्पादन का यह अवरोध स्थाई रूप से समाप्त हो गया था हरित क्रांति के आने से ।
इसका मतलब होता है उच्च पैदावार वाली किस्मों के बीजों के प्रयोग से खास करके गेहूं और चावल के उत्पादन में वृद्धि से .
प्रथम चरण
बीजों के प्रयोग के लिए पर्याप्त मात्रा में उर्वरक कीटनाशक और निश्चित मात्रा में पानी की जरूरत होती थी इनका सही मात्रा में उपयोग भी करना है बीजों की और अधिक पैदावार वाली किस्मों से लाभ उठाने वाले किसानों को सिंचाई की सुविधा और उर्वरकों और कीटनाशकों आदि की खरीददारी के लिए पैसों की जरूरत होती है इसी हरित क्रांति क्या पहले चरण में लगभग 1960 के दशक के मध्य से 1970 के दशक के मध्य तक अधिक पैदावार देने वाली बीजों का प्रयोग पंजाब आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु जैसे अमीर राज्यों तक ही सीमित रहा ।
इसके अलावा इस प्रकार के बीजों का लाभ केवल गेहूं पैदा करने वाले क्षेत्रों को ही मिल पाया।
हरित क्रांति का दूसरा चरण - हरित क्रांति के दूसरे चरण 1970 के दशक के मध्य से 1980 के दशक के मध्य तक ।
इसमें इन नए बीजों की प्रौद्योगिकी का विस्तार कई राज्यों तक पहुंच गया और कई फसलों को लाभ भी हुआ इस प्रकार से हरित क्रांति प्रौद्योगिकी के प्रसार से फसलों के उत्पादन में हमारा देश आज निर्भर बन गया अब हमें बाहर से आयात करवाने की जरूरत नहीं थी ।
उत्पादन का अर्थव्यवस्था पर कैसे प्रभाव पड़ता है ?
यदि किसान अपनी फसल को बेचने की जगह उत्पादन का बड़ा भाग स्वयं ही उपयोग करेगा तो जीडीपी में कोई असर नहीं पड़ेगा ।
लेकिन यदि किसान पर्याप्त मात्रा में उत्पादन करके फसल को बाजार में भेजता है तो अधिक उत्पादन कलाम जीडीपी में पड़ता है और जो हिस्सा किसान भेजते हैं उसको ही विपणित अधिशेष कहते हैं ।
खाद्यान्न कीमतों में कमी आना
हरित क्रांति के समय में किसान अपने गेहूं और चावल के एक्स्ट्रा उत्पादन को बाजार में बेचते थे इसी के चलते खाद्यान्नों की कीमतों में और उपभोग की वस्तुओं में उनकी दामों में कमी आई ।
इससे गरीब लोगों को बहुत फायदा हुआ था । इसके अलावा सरकार भी अच्छी मात्रा में अनाज का भंडारण कर सके।
छोटे और बड़े किसानों के बीच में समानताएं
इसमें छोटे और बड़े किसानों के बीच में आसमान तक बढ़ने की संभावना थी क्योंकि बड़े किसान ही ज्यादा लागत लगा कर के हरित क्रांति का फायदा उठा सकते थे ।
कीटनाशकों का प्रयोग यदि छोटे किसान नहीं कर पाते हैं तो उनकी फसल बर्बाद हो जाने की संभावना होती थी ।
इन सब से निपटने के लिए सरकार ने क्या प्रयास किया
इसलिए सरकार ने छोटे किसानों को लोन दिया और उर्वरकों पर आर्थिक सहायता दी जिससे छोटे किसानों को यह सारी चीज है सस्ते दाम पर उपलब्ध हो सके इस प्रकार से इनका उत्पादन बड़े किसानों के बराबर हो क्या और छोटे और बड़े सभी किसानों को लाभ मिल गया सरकार ने कई सारे अनुसंधान संस्थान स्थापित किए इनकी सेवा के कारण छोटे किसानों के जोखिम कम हो गए और कीटनाशकों के आक्रमण से उनकी फसल बचने लगी थी ।
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