mob violence and judiciary
आनाकानी पर फटकारः लिंचिंग, भीड़ की हिंसा और न्यायपालिका का आदेश
सुप्रीम कोर्ट ने भीड़ की हिंसा के लिए राज्यों और केंद्र को जवाबदेह ठहराने की कोशिश की है
‘लगातार विफलता’ की याद
\ केंद्र सरकार और कई राज्य सरकारों के लिए यह शर्म की बात है कि सुप्रीम कोर्ट को उन्हें उनकी ‘लगातार विफलता’ की याद दिलानी पड़ी है।
मुसलमानों व हाशिया पर रहने वाले तबकों की लिंचिंग और उनके खिलाफ भीड़ की हिंसा (खासकर कथित गोरक्षकों द्वारा) के विरुद्ध कदम उठाने में वे पांच साल बाद भी नाकाम रहे हैं।
नेशनल फेडरेशन ऑफ इंडियन वीमेन की एक याचिका
इस विफलता को उजागर करने वाली नेशनल फेडरेशन ऑफ इंडियन वीमेन की एक याचिका के बाद, अदालत ने केंद्रीय गृह मंत्रालय, महाराष्ट्र, ओड़िशा, राजस्थान, बिहार, मध्य प्रदेश और हरियाणा से जवाब तलब किया है।
‘तहसीन एस. पूनावाला बनाम भारत संघ’ मामले
1 सन् 2018 में, अदालत ने ‘तहसीन एस. पूनावाला बनाम भारत संघ’ मामले में यह माना था कि अपने नागरिकों की जान की हिफाजत करना राज्य का ‘परमपवित्र कर्तव्य’ है
2 और किसी तरह के ‘विजिलांटिज्म’ (स्वयंभू रक्षकों की कार्रवाइयों) को रोकना प्राधिकारियों का ‘प्रधान दायित्व’ है।
3 जिसमें हर जिले में एक नोडल [पुलिस] अफसर
वह कुछ दिशानिर्देश लेकर आयी, जिसमें हर जिले में एक नोडल [पुलिस] अफसर नियुक्त किया जाना शामिल था।
इन अफसरों को उन जिलों/ब्लॉकों/गांवों की पहचान करनी थी जहां हाल के वर्षों में भीड़ की हिंसा और लिंचिंग हुई हैं, और पुलिस के खुफिया तंत्र की मदद से, अन्य सरकारी एजेंसियों के साथ समन्वय करते हुए ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए काम करना था।
4 कानून प्रवर्तन अधिकारियों को संवेदनशील
दूसरे उपायों के साथ-साथ, उन्हें केंद्रीय गृह मंत्रालय और राज्य सरकारों की उस पहल से भी मदद मिलनी थी जिसमें कानून प्रवर्तन अधिकारियों को संवेदनशील बनाया जाना था और जनता को भीड़ की हिंसा या ‘विजिलांटिज्म’ में लिप्त होने के नतीजों के बारे में आगाह किया जाना था।
घटनाएं अब भी होती हैं
अदालत के आदेश के बाद, लिंचिंग, भीड़ की हिंसा और ‘गोरक्षा’ (यह उन अपराधियों के लिए एक गलत नाम है जो वध या मांस के लिए मवेशियों की तस्करी का आरोप लगाकर अल्पसंख्यकों के खिलाफ मनमानी हिंसा में लिप्त हैं) की घटनाएं अब भी होती हैं।
और, केंद्र सरकार और उपरोक्त राज्यों (खासकर उत्तर भारत के) द्वारा ज्यादा कुछ न किया जाना इन सरकारों की बेपरवाही की ओर इशारा करता है।
यह देख पाने के लिए किसी विशेष निष्कर्ष क्षमता की जरूरत नहीं कि केंद्र और उपरोक्त कई राज्यों में भाजपा की विचारधारा, जो अल्पसंख्यकों की रूढ़छवि बनाने और उनके दानवीकरण की छूट देती है, ने इसमें भूमिका निभायी है।
अल्पसंख्यक समुदाय के सामाजिक और आर्थिक बहिष्कार
‘विजिलांटिज्म’ के अलावा, अल्पसंख्यक समुदाय के सामाजिक और आर्थिक बहिष्कार ने भी उन राज्यों में जड़ें जमायी हैं जहां इसे राजनीतिक संरक्षण मिलता है।
- law enforcement undertaken without legal authority by a self-appointed group of people.
अदालत ने 2018 के फैसले के दिशानिर्देशों को लागू नहीं करने के लिए राज्य की एजेंसियों को जवाबदेह ठहराते हुए उन्हें नोटिस जारी कर सही किया है।
हालांकि, भीड़ की हिंसा और ‘विजिलांटिज्म’ के खतरे से निपटने के लिए लोगों को दूसरे समुदायों के साथ भाईचारे के रिश्ते रखने और उनको ‘अन्य’ के रूप में चिन्हित (टाइपकास्ट) करने से बचने के प्रति संवेदनशील बनाना होगा।
सिविल सोसाइटी के सम्मिलित प्रयास
इसमें सिविल सोसाइटी के सम्मिलित प्रयास की जरूरत होगी।
उदाहरण के लिए, तमिलनाडु में, जहां धर्मनिरपेक्ष और तार्किक आंदोलन ऐतिहासिक रूप से सक्रिय थे, ऐसी घटनाएं विरल हैं।
और अगर ऐसी घटनाएं घटती भी हैं, तो प्रभुत्वशाली राजनीतिक प्रतिनिधियों को सिविल सोसाइटी के गुस्से का सामना करना पड़ता है। सामान्य नागरिकों को क्षति पहुंचाने वाली भीड़ की हिंसा जैसे अत्याचारों को रोकने का काम सिर्फ न्यायिक आदेशों पर नहीं छोड़ा जा सकता।
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