बतौर एससीओ सदस्य भारत को फायदा हुआ है, लेकिन भविष्य उज्ज्वल नहीं है
बतौर एससीओ सदस्य भारत को फायदा हुआ है, लेकिन भविष्य उज्ज्वल नहीं है
बैठक में पहली बार भारत ने अध्यक्षता की।
मंगलवार को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा आयोजित शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) के सदस्य देशों के राष्ट्र प्रमुखों की परिषद की बैठक में पहली बार भारत ने क्षेत्रीय देशों के इस शिखर सम्मेलन की अध्यक्षता की।
भारत 2017 में पाकिस्तान के साथ एससीओ का पूर्णकालिक सदस्य बना था। सरकार का मानना है कि इस मूल रूप से यूरेशियन समूह में शामिल होना इसलिए महत्वपूर्ण था —
- क्योंकि इसके सदस्य देश वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद के एक तिहाई हिस्से,
- वैश्विक व्यापार के पांचवें हिस्से,
- वैश्विक तेल भंडार के पांचवें हिस्से
- और प्राकृतिक गैस भंडार के लगभग 44 फीसदी हिस्से के मालिक हैं।
पर भी महत्वपूर्ण रूप से ध्यान देता है। क्षेत्रीय सुरक्षा और संपर्क ऐसे क्षेत्र हैं, जो विकास के लिहाज से भारत के लिए अहम हैं और उसकी चुनौतियों का सबब बनते हैं।
मसलन, पाकिस्तान में आतंकवाद और चीन की आक्रामकता व उसकी ‘बेल्ट एंड रोड’ पहल।
खासकर जब पाकिस्तान इस संगठन का एक सदस्य है, तो “शिविर के भीतर” मौजूद रहना महत्वपूर्ण है।
भले ही इसका मतलब एससीओ क्षेत्रीय आतंकवाद विरोधी संरचना के तहत संयुक्त अभ्यास करना हो।
एससीओ भारत को मध्य एशियाई बाजारों और संसाधनों के साथ जुड़ने
एक रास्ता भी प्रदान करता है।
अंत में, एससीओ में शामिल होना दुनिया में एक “संतुलनकारी शक्ति” बनने के साथ-साथ “बहु-संयोजन” और “रणनीतिक स्वायत्तता” के मसले पर भारत की घोषित महत्वाकांक्षाओं का एक महत्वपूर्ण हिस्सा था
और यह कोई संयोग नहीं है कि मोदी सरकार ने जिस साल एससीओ की पूर्ण सदस्यता ग्रहण की, उसी साल वह अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया के साथ पुनर्जीवित क्वाड में शामिल हो गई।
बीते साल में, यह एक आर्थिक जरूरत बन गई है क्योंकि भारत ने रूस से ईंधन और उर्वरक खरीद का लाभ उठाते हुए यूक्रेन युद्ध के मसले पर तटस्थ रहना चुना है।
उम्मीद
लिहाजा, यह उम्मीद की जा रही थी कि इस साल एससीओ की अध्यक्षता करने की भारत की बारी एक बड़ी परिघटना होगी
जो सितंबर में आयोजित जी-20 की बैठक के इर्द-गिर्द होने वाली अपेक्षित धूमधाम को टक्कर देगी।
इसके अलावा जी-20 की संयुक्त विज्ञप्ति, जिस पर भारत आम सहमति बनाने का इच्छुक है, के मसले पर रूस और चीन के अवरोधों के मद्देनजर एससीओ शिखर सम्मेलन श्री मोदी के लिए अपने समकक्षों के साथ इस संबंध में एक समाधान पर बातचीत करने का एक सुविधाजनक स्थल होगा।
एससीओ के नतीजों पर प्रतिकूल प्रभाव
हालांकि, प्रधानमंत्री की अमेरिका की राजकीय यात्रा की वजह से एससीओ शिखर सम्मेलन को स्थगित करने और फिर इसे एक आभासी (वर्चुअल) शिखर सम्मेलन में तब्दील करने का भारत का फैसला एससीओ के नतीजों पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकता है।
ऐसा करने के पीछे वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर शत्रुता के मद्देनजर शी जिनपिंग की मेजबानी को लेकर भारत की चिंताएं
या पाकिस्तान के प्रधानमंत्री श्री शरीफ की संभावित ‘नुमाइश’ या यहां तक कि रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के स्वागत के दृश्य भी कारक हो सकती हैं।
विफलता
वजह चाहे जो भी रही हो, एससीओ के सदस्य देशों ने जहां कट्टरपंथ और डिजिटल बदलाव पर नई दिल्ली घोषणा और संयुक्त बयानों को खारिज कर दिया ।
वहीं सरकार अंग्रेजी को एससीओ की औपचारिक भाषा बनाने सहित अन्य समझौतों पर आम सहमति बनाने में असमर्थ रही।
उधर अध्यक्ष होने के बावजूद, भारत ने आर्थिक सहयोग से संबंधित किसी रोडमैप का समर्थन नहीं किया।
ऐसा शायद इस रोडमैप पर चीन की छाप होने से जुड़ी उसकी चिंताओं की वजह से हुआ।
एससीओ की अध्यक्षता समाप्त होने के साथ, सरकार अब शायद एससीओ के साथ अपने जुड़ाव के मसले पर घटते फायदे के नियम के असर को महसूस कर रही है, जोकि जी-20 की मेजबानी के उसके कार्य को और भी मुश्किल बना सकता है

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