(DBFOT) मॉडल: PPP का एक ज़रूरी हिस्सा

 


डिज़ाइन, बिल्ड, फ़ाइनेंस, ऑपरेट और ट्रांसफ़र (DBFOT) मॉडल: PPP का एक ज़रूरी हिस्सा

पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप (PPP), जिसे हिंदी में सार्वजनिक-निजी भागीदारी कहते हैं, सरकार (यानी पब्लिक सेक्टर) और प्राइवेट कंपनियों (यानी प्राइवेट सेक्टर) के बीच एक लंबा समझौता होता है। इसका मकसद सड़क, एयरपोर्ट, बिजली प्लांट या वेस्ट मैनेजमेंट जैसी पब्लिक इन्फ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स को बनाना, पैसा लगाना और चलाना होता है।

PPP क्यों है इतना अहम?

  • संसाधनों का सही इस्तेमाल: कई बार बड़े प्रोजेक्ट्स के लिए सरकार के पास पूरे पैसे या खास जानकारी नहीं होती। PPP से प्राइवेट सेक्टर की पैसों की ताक़त, तकनीकी जानकारी और बेहतर काम करने की क्षमता का फ़ायदा मिलता है।
  • जोखिम बांटना: प्रोजेक्ट से जुड़े जोखिम (जैसे काम में देरी, लागत का बढ़ना) सरकार और प्राइवेट कंपनी के बीच बंट जाते हैं, जिससे किसी एक पर ज़्यादा बोझ नहीं पड़ता।
  • काम में तेज़ी: प्राइवेट सेक्टर की दक्षता (efficiency) और नए तरीक़े अपनाने से प्रोजेक्ट्स समय पर और तय बजट में पूरे हो पाते हैं।
  • बेहतर सेवाएं: नागरिकों को ज़्यादा अच्छी क्वालिटी की सेवाएं मिल पाती हैं।



DBFOT मॉडल को समझें

DBFOT का पूरा नाम है: डिजाइन (Design), बिल्ड (Build), फ़ाइनेंस (Finance), ऑपरेट (Operate) और ट्रांसफ़र (Transfer)। यह PPP का एक बहुत ही पॉपुलर मॉडल है, ख़ासकर बड़े इन्फ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स में।

इस मॉडल में, सरकार एक प्राइवेट कंपनी (जिसे रियायती या कन्सेशनेयर कहते हैं) से किसी प्रोजेक्ट के लिए समझौता करती है। इस समझौते में प्राइवेट कंपनी की ये ज़िम्मेदारियाँ होती हैं:

  1. डिजाइन (Design): प्राइवेट कंपनी प्रोजेक्ट का पूरा डिज़ाइन तैयार करती है, जिसमें आर्किटेक्चरल, इंजीनियरिंग और टेक्निकल स्पेसिफिकेशन्स शामिल होते हैं।
  2. बिल्ड (Build): प्राइवेट कंपनी अपने संसाधनों और जानकारी का इस्तेमाल करके उस प्रोजेक्ट का निर्माण करती है।
  3. फ़ाइनेंस (Finance): प्रोजेक्ट के निर्माण और विकास के लिए ज़रूरी ज़्यादातर या पूरा पैसा प्राइवेट कंपनी ही जुटाती है। इसमें बैंक से लोन, इक्विटी निवेश या दूसरे तरीक़ों से फ़ंड इकट्ठा करना शामिल हो सकता है।
  4. ऑपरेट (Operate): निर्माण पूरा होने के बाद, प्राइवेट कंपनी एक तय समय तक (जिसे रियायत अवधि या कन्सेशन पीरियड कहते हैं, जैसे दिल्ली ई-वेस्ट पार्क के मामले में 15 साल) उस प्रोजेक्ट का संचालन (operation) और रखरखाव (maintenance) करती है। इस दौरान, कंपनी आमतौर पर प्रोजेक्ट से कमाई करती है, जैसे टोल या यूज़र चार्ज से।
  5. ट्रांसफ़र (Transfer): रियायत अवधि ख़त्म होने के बाद, प्राइवेट कंपनी प्रोजेक्ट को सरकार को (आमतौर पर अच्छी हालत में) वापस ट्रांसफ़र कर देती है। इस बिंदु पर, प्रोजेक्ट का मालिकाना हक़ और उसे चलाने की ज़िम्मेदारी सरकार के पास वापस आ जाती है।

कुछ उदाहरण (Examples):

भारत में DBFOT मॉडल के कई उदाहरण हैं, ख़ासकर सड़क और हाइवे प्रोजेक्ट्स में:

  • टोल सड़कें और हाइवे: यह DBFOT का सबसे आम उदाहरण है। जैसे दिल्ली-नोएडा टोलवे (DND Flyway) में एक प्राइवेट कंपनी ने फ़्लाईओवर का डिज़ाइन, निर्माण, फ़ाइनेंस और संचालन किया। एक तय समय तक टोल वसूलने के बाद, मालिकाना हक़ सरकार को ट्रांसफ़र कर दिया गया या किया जाएगा। इसमें प्राइवेट कंपनी सड़क का निर्माण करती है, पैसे लगाती है, और फिर टोल वसूल कर अपनी लागत और मुनाफ़ा कमाती है। एक निश्चित समय बाद, सड़क सरकार को सौंप दी जाती है।
  • बंदरगाह और हवाई अड्डे: कई नए बंदरगाह टर्मिनल और हवाई अड्डे भी DBFOT मॉडल पर बने हैं। कुछ नए प्राइवेट हवाई अड्डे या उनके टर्मिनल इसी मॉडल पर विकसित किए गए हैं, जहाँ प्राइवेट ऑपरेटरों ने निवेश किया, निर्माण किया, और वे अब उनका संचालन कर रहे हैं।
  • ठोस अपशिष्ट प्रबंधन और ई-वेस्ट पार्क: जैसा कि हमने दिल्ली के ई-वेस्ट इको-पार्क के बारे में देखा, यह भी इसी मॉडल पर बनेगा। यहाँ दिल्ली सरकार ने एक प्राइवेट पार्टनर को 11.4 एकड़ में ई-वेस्ट पार्क को डिजाइन, बिल्ड, फाइनेंस, ऑपरेट करने के लिए चुना है। यह प्राइवेट पार्टनर 15 साल तक इसका संचालन करेगा और उसके बाद इसे दिल्ली सरकार को ट्रांसफर कर देगा। इस 15 साल की अवधि में प्राइवेट पार्टनर ई-कचरे के प्रसंस्करण से राजस्व कमाएगा।

तो, सीधे शब्दों में कहें तो, DBFOT मॉडल एक ऐसी व्यवस्था है जहाँ सरकार और प्राइवेट सेक्टर मिलकर किसी प्रोजेक्ट को पूरा करते हैं। इसमें प्राइवेट सेक्टर अपनी ख़ास जानकारी और पैसों का इस्तेमाल करता है, और अंत में प्रोजेक्ट को सरकार को वापस सौंप देता है।

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