ग्लेशियरों के सिकुड़ने से पैदा होने वाले खतरों को चक्रवात और भूकंप के समान जोखिम वाली श्रेणी में शामिल करना चाहिए

 

बर्फीली चेतावनी: सिकुड़ते ग्लेशियरों से उपजे खतरे

ग्लेशियरों के सिकुड़ने से पैदा होने वाले खतरों को चक्रवात और भूकंप के समान जोखिम वाली श्रेणी में शामिल करना चाहिए 



कुछ बैरोमीटर जलवायु संकट को स्वाभाविक रूप से निम्नतापमंडल (क्रायोस्फीयर) के एक प्रमुख घटक माने जाने वाले हिमनदों (ग्लेशियर) की स्थिति के बराबर ही मापते हैं।


 विश्व मौसम विज्ञान संगठन की हालिया रिपोर्ट “द ग्लोबल क्लाइमेट 2011-2020” 


ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन के प्रति इस धरती की प्रतिक्रिया के बारे में एक व्यापक नजरिया पेश करती है। 


इस रिपोर्ट के ग्लेशियरों के स्वास्थ्य की स्थिति वाले खंड में यह बताया गया है कि 2011 से लेकर 2020 के दौरान दुनिया के ग्लेशियर औसतन प्रति वर्ष लगभग एक मीटर पतले हो गए। 


जब इस परिघटना की दशकों के आधार तुलना की जाती है, तो क्षेत्रवार स्तर पर महत्वपूर्ण भिन्नताएं दिखाई देतीं हैं।


 लेकिन समग्र पैटर्न यह है कि दुनिया के सभी क्षेत्रों में ग्लेशियर छोटे होते जा रहे हैं। 


दरअसल कुछ संदर्भित ग्लेशियर, जिनका उपयोग ग्लेशियरों के स्वास्थ्य का दीर्घकालिक आकलन करने के लिए किया जाता है, पहले ही पिघल चुके हैं क्योंकि सर्दियों के समय जमने वाली बर्फ गर्मियों के दौरान पूरी तरह से पिघल रही है। 


अफ्रीका में, रवेंजोरी पर्वत और माउंट केन्या के ग्लेशियरों के 2030 तक और किलिमंजारो के ग्लेशियर के 2040 तक गायब होने का अंदेशा है। 


यह रिपोर्ट ग्लेशियर से बनने वाली झीलों के तेजी से विकास और ग्लेशियर निर्मित झील के विस्फोट से पैदा होने वाले बाढ़ (जीएलओएफ) की संभावना की ओर इशारा करती है, जोकि पारिस्थितिकी तंत्र (इकोलॉजी) और आजीविका के लिए अतिरिक्त खतरे साबित होंगे। 


इस रिपोर्ट में यह बताया गया है कि कैसे “...ग्लेशियल के पिघलने से बने पानी ने दशक की सबसे भयंकर बाढ़ में से एक, जून 2013 की उत्तराखंड बाढ़ में योगदान दिया”।



जीएलओएफ परिघटना 



का कहर इस साल सिक्किम में चुंगथांग बांध के नष्ट होने से सामने आया। वहां पिघलते ग्लेशियर के चलते दक्षिण लोनक झील में बाढ़ आ गई और 


इससे ढलान पर स्थित इलाकों में तबाही मच गई।



इंटरनेशनल सेंटर फॉर इंटीग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंट की एक रिपोर्ट  


इस साल की शुरुआत में, इंटरनेशनल सेंटर फॉर इंटीग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंट की एक रिपोर्ट में पाया गया कि हिंदूकुश हिमालय में ग्लेशियरों का गायब होना “पहले के दशकों की तुलना में 2010 के दशक के दौरान 65 फीसदी ज्यादा तेजी से हुआ”।


 वैश्विक स्तर पर होने वाले ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन की वर्तमान दर, जिससे इस सदी के अंत तक तापमान में 2.5 डिग्री सेल्सियस से लेकर तीन डिग्री सेल्सियस तक की वृद्धि होने का अनुमान है, के हिसाब से ग्लेशियरों की मात्रा में 55 फीसदी से लेकर 75 फीसदी तक की गिराव टआने का अंदेशा है। 


इसका मतलब यह हुआ कि 2050 के आसपास तक मीठे पानी की आपूर्ति में भारी कमी आएगी। 


वातावरण के गर्म होने (वार्मिंग) के प्रति ग्लेशियर प्रणालियों की संवेदनशीलता उनकी सावधानीपूर्वक निगरानी की जरूरत को रेखांकित करती है। 


हिमालय के ग्लेशियरों से उत्पन्न होने वाले खतरों के बारे में जागरूकता होने के बावजूद जीएलओएफ परिघटनाओं के अंदेशों के लिए कोई पूर्व चेतावनी प्रणाली नहीं है। 


चक्रवातों, बाढ़ों और भूकंपों के खतरों की पूर्व चेतावनियों की तरह ही अधिकारियों को ग्लेशियरों के सिकुड़ने से होने वाले खतरों को भी जोखिम की उसी श्रेणी में रखना चाहिए। 


इसके अनुरूप ही जोखिम का व्यापक आकलन करने, संवेदनशील क्षेत्रों का मानचित्र बनाने और देखभाल के उच्चतम मानकों के साथ बुनियादी ढांचे के विकास को शुरू करने की जरूरत है।


source the hindu 

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