विवादित क्षेत्र एस्सेक्विबो
वेनेजुएला द्वारा एक विशाल एवं तेल के मामले में समृद्ध विवादित क्षेत्र एस्सेक्विबो, जो अब पड़ोसी गुयाना का हिस्सा है, पर अपनी संप्रभुता का इस्तेमाल करने के मुद्दे पर जनमत संग्रह कराने के कदम ने पुराने जख्मों को हरा कर दिया है और दो दक्षिण अमेरिकी देशों के बीच तनाव को बढ़ा दिया है।
वेनेजुएला के निर्वाचन अधिकारियों के मुताबिक, 95 फीसदी से ज्यादा मतदाताओं ने देश के दावे का समर्थन किया।
अगले राष्ट्रपति चुनाव में कुछ ही महीने बाकी
अभी यह साफ नहीं है कि राष्ट्रपति निकोलस मादुरो की सरकार आगे क्या करेगी, लेकिन तथ्य यह है कि उन्होंने अगले राष्ट्रपति चुनाव में कुछ ही महीने बाकी रहते हुए यह जनमत संग्रह कराया है।
इससे पता चलता है कि यह वामपंथी नेता सीमा पर तनाव को जारी रख सकता है।
वेनेजुएला ने हमेशा एस्सेक्विबो पर अपना दावा जताना जारी रखा है
उसका कहना है कि एक सदी पहले औपनिवेशिक ताकतों द्वारा उत्तर-दक्षिण सीमा खींचे जाने के समय इस इलाके को उससे चुरा लिया गया था।
वर्ष 1966 में, वेनेजुएला और यूनाइटेड किंगडम (यू.के.) ने सभी के लिए एक व्यावहारिक, शांतिपूर्ण और संतोषजनक समाधान खोजने का प्रयास करते हुए यथास्थिति बनाए रखने के वास्ते सीमा (गुयाना एक ब्रिटिश उपनिवेश था) मसले पर एक अस्थायी जिनेवा समझौता किया था।
तनाव कम ?
जब श्री मादुरो के वामपंथी पूर्ववर्ती ह्यूगो चावेज राष्ट्रपति थे, तब तनाव कम हुआ। लेकिन जब तेल के क्षेत्र में आए उछाल ने गुयाना की अर्थव्यवस्था को बदलना शुरू कर दिया, तो श्री मादुरो के शासन ने ज्यादा मुखर होकर इस इलाके पर अपने देश का दावा जताना शुरू कर दिया।
लैटिन अमेरिका में एकमात्र अंग्रेजी भाषी देश गुयाना का कहना है कि अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थों (ब्रिटेन, रूस और संयुक्त राज्य अमेरिका) के बीच हुआ 1899 का सीमा समझौता अंतिम है और उसने 2018 में अंतरराष्ट्रीय न्यायालय का दरवाजा खटखटाया एवं फैसला देने की गुजारिश की।
इलाका 1899 के समझौते का हिस्सा नहीं
दूसरी तरफ वेनेजुएला ने हमेशा तर्क दिया है कि यह इलाका 1899 के समझौते, जिसे वह अमान्य कहता है, का हिस्सा नहीं था।
जब गुयाना ने जनमत संग्रह पर प्रतिबंध लगाने की गुजारिश करते हुए विश्व अदालत का रुख किया, तो अदालत ने ऐसा करने से इनकार कर दिया।
लेकिन उसने कराकस से जनमत संग्रह के आधार पर यथास्थिति को बदलने वाला कोई कार्रवाई नहीं करने को कहा।
लेकिन श्री मादुरो पहले ही इस विवाद पर विश्व अदालत के क्षेत्राधिकार को खारिज कर चुके हैं।
उन पर स्वतंत्र चुनाव कराने का अंतरराष्ट्रीय दबाव बढ़ रहा है। हाल ही में, संयुक्त राज्य अमेरिका ने वेनेजुएला पर लगाए गए प्रतिबंधों में ढील दी क्योंकि मादुरो सरकार ने अगले साल के चुनाव के लिए विपक्ष के साथ समझौता किया।
श्री मादुरो ने जहां राजकीय संस्थानों पर अपनी कड़ी पकड़ बनाए रखी हुई है, वहीं वह उन वर्गों के बीच भी अलोकप्रिय हैं जो अर्थव्यवस्था के हालात, खासकर जरूरी सामानों की किल्लत और बेतहाशा महंगाई से खफा है।
हालांकि सीमा संकट उनके लिए घरेलू संकटों से ध्यान भटकाने वाला एक मुफीद मसला साबित हो सकता है क्योंकि चुनाव नजदीक आ रहे हैं। लेकिन यह उन अनगिनत संकटों का कोई हल नहीं पेश करता है जिनसे तेल के मामले में समृद्ध यह दक्षिण अमेरिकी देश रूबरू है।
जो भी हो, सीमा संघर्ष हालात को और भी बिगाड़ देगा। श्री मादुरो को कोई भी एकतरफा कार्रवाई करने से बचना चाहिए और जिनेवा समझौते की सच्ची भावना के अनुरूप बातचीत के जरिए गुयाना के साथ इलाका संबंधी मुद्दों को हल करने का प्रयास जारी रखना चाहिए।
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