जाति व्यवस्था को लेकर क्या कहना था तुलसीदास का
जाति व्यवस्था को लेकर क्या कहना था तुलसीदास का ?
“सुना है, आप जाति-पांति नहीं मानते?”
“मानता हूँ और नहीं भी मानता।”
“कैसे?”
“वर्णाश्रम धर्म को मानता हूँ परन्तु प्रेम धर्म को वर्णाश्रम से भी ऊपर मानता हूँ।”
युवक मण्डली तुलसी की हाजिर जवाबी से अब चिढ़ उठी थी। उनमें से एक तीखा पड़ा, बोला—
“आप क्या अवधूत हैं?”
दूसरा बोला—“अजी अवधूत-वौधूत कुछ भी नहीं। विशुद्ध पाखण्डी हैं ये। जो एक नीच-हत्यारे के पैर धोए, उसे भोजन कराए, वह ब्राह्मण भी कदापि नहीं हो सकता।”
“तो इनको ब्राह्मण कहता ही कौन है। यह किसी ब्राह्मणी कुलटा के गर्भ से उत्पन्न राजपूत हैं।”
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