उल्का और उल्कापिंड
उल्का और उल्कापिंड
कभी-कभी रात के समय आकाश में कोई चमकता बिंदु, चमकीली रेखा खींचता हुआ गायब हो जाता है। इसे सामान्यतः तारा टूटना कहते है। लेकिन तारे तो कभी टूटते नहीं टूटकर गिरने वाले ये पिंड तारे नहीं बल्कि उल्काएं होती हैं। ये बड़ी तेज गति से पृथ्वी के वायुमंडल में प्रवेश करते हैं और हवा में रगड़ खाकर जल उठते हैं। उनका यह जलना ही हमें टूटते तारा जैसा नजर आता है। उल्काएं नहीं सौर परिवार की सदस्य हैं। जब कोई खगोलीय पिंड गति करता हुआ पृथ्वी के पास आता है तो धरती की आकर्षण शक्ति से खिंचकर पृथ्वी की ओर आता है और पृथ्वी पर गिर पड़ता है।
आसमान के गिरी हुई सभी उल्काएं धरती तक नहीं पहुंचती। उनमें से अधिकांश रास्ते में ही हवा की रगड़ से जलकर नष्ट हो जाती हैं या भाप और राख बन जाती हैं, लेकिन जब कोई उल्का पूरी तरह नहीं जल पाती और धरती पर गिर जाती है तब उसके अवशेष को उल्कापिंड कहते हैं।
चंद्रमा, मंगल और बुध ग्रहों पर उल्कापिंडों के गिरने से ही गड्ढ़े बन गए हैं। पृथ्वी पर सबसे बड़ा गढ्डा जो उत्तरी ऐरिजोना में है, शायद उल्कापिंड के टकराने से बना। 1265 मीटर व्यास के इस क्रेटर की गहराई 175 मीटर है। यह गड्ढ़ा लगभग 25,000 वर्ष पहले बना था।
ऐसा अनुमान है कि प्रतिदिन साढ़े सात करोड़ उल्काएं पृथ्वी के वायुमंडल में प्रवेश करती हैं। इनकी गति 35-95 किमी. प्रति सेकण्ड होती है। एक साधारण उल्का को भाप बनने में लगभग एक सेकंड का समय लगता है। हर साल लगभग 500 उल्कापिंड पृथ्वी की सतह पर गिरते हैं। सबसे बड़ा उल्का पिंड जो धरती पर गिरा उसका भार 37 टन था। उल्का पिंड तीन प्रकार के होते है। धूमकेतु जैसे, पत्थर जैसे और आग की गेंदनुमा जैसे। अधिकांश उल्कापिंड पत्थर, लोहा, निकल और दूसरे तत्वों से मिलकर बने हैं।
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