धूमकेतु

धूमकेतु

धूमकेतु ऐसे खगोलीय पिंड हैं, जिनकी धुएं जैसी लंबी चमकदार पूंछ होती है। इनको पुच्छल तारा भी कहते है। पहले लोग इनको देखकर भयभीत हो जाया करते थे। वे इनको विनाश का सूचक समझते थे। लेकिन अब लोगों को इनके रहस्य का पता चल गया है और अब वे ऐसा नहीं समझते।

धूमकेतु सौर परिवार के अनेक आकाशीय पिंडों की तरह है। पृथ्वी की भांति इनका भी एक निश्चित पथ है, लेकिन इनका आकार भिन्न होता है। ऐसा अनुमान है कि 100 वर्ष में लगभग 1000 धूमकेतु होते हैं, जिनको बगैर दूरबीन के देखा जा सकता है। हेली धूमकेतु इनमें सबसे प्रसिद्ध है, जो 76 वर्ष बाद सूर्य के पास से गुजरता है। इसको सबसे पहले इंग्लैण्ड के खगोलविद् एडमंड हेली ने सन् 1682 में देखा था। उन्हीं के नाम पर इसे हेली धूमकेतु कहते हैं। अभी कुछ वर्ष पहले सन् 1986 में इसे देखा गया था। उस समय गिओटी स्पेस प्रोब ने इसके फोटो लिए। अब इसे सन् 2061 में देखा जाएगा। अब तक खोजे गए सभी धूमकेतुओं में हेली सबसे बड़ा है।

धूमकेतु के तीन भाग होते है। नाभि, सिर, तथा पूंछ। नाभि धूमकेतु के सिर का सबसे चकीला भाग है। नाभि का व्यास 100-10,000 मीटर तक हो सकता है। हेली धूमकेतु की नाभि का व्यास लगभग 5,000 मीटर है। अमोनिया, धूल, गैस जैसे अनेक तत्वों से बनी बर्फ की यह दूषित धूल, गैस जैसे अनेक तत्वों से बनी बर्फ की यह दूषित गेंद जो नाभि कहलाती है। प्रकाश को प्रतिबिंबित करती हुए सिर के केंद्र से चमकती हुई दिखाई देती है। नाभि के चारों ओर के भाग को सिर कहते हैं। यह गैस और धूल से बना होता है, जिसका व्यास 2000,000 लाख किमी. से भी अधिक हो सकता है। सिर हाइड्रोजन गैस के बादलों से घिरा रहता है। पूंछ धूमकेतु का खास भाग है। धूमकेतु की पूंछ दो प्रकार की होती है। डस्टटेल जो दस लाख से एक करोड् किमी. लंबी होती है तथा प्लाज्मा टेल यानी अत्यंत गर्म आयोनाइज्ड गैस की पूंछ जो दस करोड़ किमी. लंबी होती है।

धूमकेतु की पूंछ तभी बनती है, जब वह सूर्य के नजदीक आ जाता है। सूर्य का प्रकाश उनके सिर की कुछ गैस को परे ढकेलता है और यही गैस, पूंछ की तरह चमकने लगती है। जैसे ही यह सूर्य के पास आता है, बड़ी तेजी से चक्कर काटते हुए अपनी पूंछ को आगे करते हुए सूर्य से दूर चला जाता है। धूमकेतु की पूंछ हमेशा सूर्य की विपरीत दिशा में होती है।

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