देवबलोदा का प्राचीन शिव मंदिर
देवबलोदा का प्राचीन शिव मंदिर
इस प्राचीन मंदिर से लोगों की आस्था ऐसी है कि कोई भी मनोकामना छह महीने में पूरी हो जाती है।
भिलाई. दुर्ग जिला मुख्यालय से करीब 20 किलोमीटर दूर ग्राम देवबलोदा में भगवान शिव प्राचीन मंदिर है। जिसका नाम छहमासी मंदिर भी है।
7वीं शताब्दी में राजा विक्रमादित्य थे, जिन्होंने इस मंदिर का निर्माण कराया। कुछ कहते हैं कि इसका निर्माण 11वीं से 13 वीं शताब्दी के बीच में हुआ है।
निर्माण
भगवान शिव को समर्पित इस मंदिर का निर्माण 12वीं से 13 शताब्दी के बीच कलचुरी कालीन राजाओं के द्वारा कराया गया था ,यह अधूरा मंदिर, लाल बलुवा पत्थरों से नागर शैली में बनाया गया है। जिसका मंडप भाग नवरंग शैली में बना हुआ है।
इसके हर पत्थर में मां दुर्गा, काली, गणेश व हाथी, घोड़े के अलावा अन्य पौराणिक कलाकृतियां देखने को मिलती हैं।
मंदिर का निर्माण ऊंची जगती पर किया गया है।
मंदिर के पुजारी ने बताया कि पहले छह महीने सिर्फ एक व्यक्ति रात में यह मंदिर बनाता था। इस वजह से इसे छहमासी मंदिर कहा जाता है।
अधूरा रह गया मंदिर
गांव के जानकार बताते है कि शिल्पकार की पत्नी रोज खाना लेकर आती थी। एक दिन उसकी बहन खाना लेकर आई। कारीगर नग्न अवस्था में मंदिर का निर्माण कर रहा था।
अपनी बहन को देखकर वह मंदिर के निकट स्थित कुंड में कूद गया। उसकी बहन मंदिर के पीछे स्थित तालाब में कूद गई।
इस वजह से मंदिर के ऊपर गुम्बद का निर्माण नहीं हो पाया। मंदिर अधूरा रह गया। आज भी इसी हालत में लोग यहां दर्शन करने पहुंचते हैं।
मंदिर के अंदर
माता पार्वती ,भगवान जगन्नाथ व कई देवी देवताओं की प्रतिमा स्थापित है। प्रवेश द्वार के ठीक समीप भगवान गणेश की दो भव्य प्रतिमा बनी हुई है।
मंदिर के ठीक सामने भगवान शिव की सवारी नदी विराजमान है।
मंदिर में दो प्रवेश द्वार है एक प्रवेश द्वार से कुंड तक पहुंचा जाता है।
कुंड के समीप पीपल पेड़ के नीचे कई खंडित प्रतिमा संरक्षित करके रखा गया है।
मंदिर के पास एक प्राचीन कुंड है
जिसका जल कभी नहीं सूखता है। भक्तजन कुंड के जल से शिवजी का अभिषेक करते हैं। भक्तों की माने तो इस पवित्र कुंड के जल से स्नान करने मात्र से सभी रोग का नाश होता है।घर की शुद्धि के लिए इस जल का छिड़काव करते है।
मंदिर के कुंड के बारे में कहा जाता है
कि इस कुंड के अंदर दो कुए हैं।जिसमें एक कुआं का संबंध सीधा पाताल लोक से है। जिसमें निरंतर जल की धारा प्रवाहित होती रहती है।
और दूसरे कुएं के अंदर एक गुप्त सुरंग बना हुआ है। जो आरंग में जाकर निकलता है, शिल्पकार इसी सुरंग मार्ग से अंदर ही अंदर आरंग पहुंच गया और श्राप वस वह आरंग में पत्थर का बन गया।
इस कुंड में कुल 23 सीढ़ी है. इसके साथ ही एक कुंड में पाताल तोड़ कुआं है. जिससे लगातार पानी निकलता रहता है.
छैमासा मंदिर
स्थानीय निवासियों के अनुसार इस मंदिर का निर्माण 6 मासी रात में कराया गया था 6 मास बीत जाने के पश्चात दिन हो गए जिसके बाद यह मंदिर ऐसी ही अधूरा छोड़ दिया,ऊपर का हिस्सा नहीं बन पाया ।।।
एक और किदवंती के अनुसार,मंदिर का शिल्पीकार मंदिर को बनाने में इतना व्यस्त हो चुका था की उसे अपने कपड़े पहनने तक का होश नहीं था दिन रात काम करते-करते वह निर्वस्त्र हो चुका था।
शिल्पीकार की पत्नी रोज शिल्पकार को भोजन लाकर देती थी। एक दिन किसी कारणवश शिल्पकार की बहन को खाना लाना पड़ गया , भोजन लेकर जैसे मंदिर पहुंची शिल्पकार नग्न अवस्था में था।
बहन को आता देख शर्मिंदा के डर से मंदिर से छलांग लगाकर नजदीक में जो कुंड है। उसमें कूद गया उसकी बहन ने देखा कि मेरे भैया मेरे कारण मंदिर से कूदकर आत्महत्या कर ली है। ऐसा समझकर सामने के ही तालाब में छलांग लगाकर अपनी प्राण दे देती है।
करसा तालाब
आज भी इस मंदिर में कुंड और तालाब मौजूद है. तालाब का नाम करसा तालाब है. क्योंकि जब शिल्पकार की बहन उसके लिए खाना लेकर आ रही थी.
कलशनुमा पत्थर
तब उसके हाथ में भोजन और सिर पर पानी का कलश था. इस तालाब के बीच में आज भी कलशनुमा पत्थर है.
शिल्पकार की मूर्ति आज भी आरंग में
इस मंदिर का निर्माण करने वाला कारीगर इस मंदिर को अधूरा छोड़कर गुप्त सुरंग के जरिए आरंग भाग गया. लेकिन वहां पहुंचने के बाद वह श्राप की वजह से पत्थर का हो गया. उस शिल्पकार की मूर्ति आज भी आरंग में मौजूद है".
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