जब तुलसीदास जी के पुत्र की मृत्यु हुई और पत्नी मिलने आईं
जब तुलसीदास जी के पुत्र की मृत्यु हुई और पत्नी मिलने आईं
ब्रह्मदत्त घटवाले के घर में अपनी कोठरी में तुलसीदास बैठे जप कर रहे हैं। राजा भगत कोठरी में प्रवेश करते हैं। तुलसीदास का ध्यान विचलित नहीं होता। राजा कुछ देर खड़े रहने के बाद उनकी चौकी के पास बैठ जाते हैं किन्तु तुलसी का ध्यान भंग नहीं होता है। उनके कानों में मृदंगों और झाँझों का सम्मिलित स्वर राम-राम बनकर गूँज रहा है। राजा को खाँसी आ जाती है और वह खाँसी तुलसी के मन की एकरसता में व्याघात पहुँचाती है। आँखें खुलती तो हैं पर उनमें उजाला क्रमशः ही आता है। राजा को देखकर वे प्रसन्न होते हैं, कहते हैं—
“कहो राजन् फिर वही आग्रह लेकर आए हो?”
उदास स्वर में राजा ने नख से धरती खुरचते हुए कहा—“हम तुमसे कुछ भी कहने नहीं आए भइया, तुम अब राम जी के हो, हमारे थोड़े ही रहे।”
तुलसी ने शान्तभाव से कहा—“राम जी सबके हैं, फिर उनका चाकर भला सबका चेरा क्यों न होगा?”
“तो भौजी में राम को क्यों नहीं देखते हो? और कितना दण्ड देओगे बिचारी को?”
राजा के स्वर में आक्रोश था।
तुलसीदास ने अपना सिर झुका लिया, फिर गम्भीर स्वर में उत्तर दिया—“तुम्हारी भौजी के प्रति मेरे मन में कोई दुर्भावना नहीं है, राजा। उन्होंने मेरे प्रति अनन्त उपकार किया है।”
“और तुम राम रूपी छुरी लेकर कसाई की तरह उस बेचारी को मारने पर ही तुल गए हो। ये तुम्हारी भगती है या स्वारथ?
तुम्हारा पुन्न है या पाप?
ऐसी औरत लाखों-करोड़ों में ढूँढे नहीं मिल सकती।
तुम्हारे लिए मेरे मन में जैसा अच्छा भाव था वैसा ही अब करोध हरदम बना रहता है।
सारी बस्ती, आर-पार के गाँव भौजी बिचारी का कष्ट देखकर हाय-हाय कर रहे हैं और एक तुम हो जो हमारे बार-बार आने पर भी हमसे कतराते रहे।
जो ऐसे ही हमसे मुँह फेरना था तो नेह क्यों लगाया था?”
तुलसीदास ने अपनी शान्ति तब भी न खोई। वे सरककर चौकी के कोने पर आ गए और राजा के कन्धे पर अपना हाथ रखकर कहा—
“तुम्हारे आक्रोश के लिए मेरे मन में सहानुभूति है, रत्नावली के लिए तो मेरा मन अनन्त शुभ कामनाओं से भरा हुआ है।”
राजा ने उनकी बात पर अपनी बात चढ़ाते हुए उत्तेजित स्वर में कहा—
“तो फिर भौजी से ही यह सब कहो। एक बार उनसे मिल लोगे…”
बात काटकर तुलसी ने दृढ़ स्वर में कहा—
“यह असम्भव है।”
“क्यों?”
“मैं अब विरक्त हो चुका। मेरा मार्ग बदल नहीं सकता। मिलकर क्या करूँगा?”
राजा ने गम्भीर उदास स्वर में कहा—“तुम्हें मालूम है भैया, मुन्ना नहीं रहा।”
तुलसीदास के मन में महीनों के श्रम से जमाई हुई शान्ति पल के हज़ारवें अंश में ही बालू की दीवार की तरह ढहने लगी। अचानक मुँह से निकला—
“मेरा तारापति! कहाँ गया?”
“राम जी के घर।”
“राम जी के घर।”
स्वगत बड़बड़ाते हुए तुलसीदास की आँखों के आगे अँधेरा छा गया। मन में ऐसा आभास हुआ कि जैसे उनके भीतर रमी हुई लय बिखर रही हो और कलेजे में छुरा भुँकता चला जा रहा हो।
खोए-लड़खड़ाए स्वर में आप ही आप पूछ बैठे—
“क्या हुआ था उसे?”
“बड़ी माता निकली थी, उसी में चला गया।”
तुलसीदास की आँखें छलछला उठीं। मन करुण होकर अपने राम को गुहारने लगा—
“यह तुमने क्या किया राम? यह कैसी परीक्षा ली?”
और अबकी तह में दबा अपना ही एक और आदेश-भरा स्वर गूँजा। हानि, लाभ, जीवन, मरण, यश, अपयश यह सब विधि के हाथ में है। अपना जप न छोड़। राम की माया में तू बोलने वाला कौन है?”
राजा धीमे, करुण स्वर में कह रहे थे—“भौजी तुमसे कुछ नहीं चाहतीं, बस एक बार तुमसे मिल लेना चाहती हैं। तुम्हारे दरसन करके उन्हें सब कुछ मिल जाएगा।”
तुलसी के आँसू थम गए। कराहता कलेजा सहसा कठोर हो गया, बोले—
“अब मैं चित्रकूट से कहीं नहीं जाऊँगा।”
“भौजी यहीं आई हैं।”
राजा की इस बात से तुलसीदास फिर चौंके, चौकी से उठकर कोठरी में चक्कर लगाने लगे। एकाएक दीवार पर लिखे हुए राम शब्द से उनकी दृष्टि जुड़ी।
ठिठककर खड़े हो गए और शब्द की ओर देखते हुए राजा से कहा—
“मैं विरक्त हूँ। मेरे न कोई स्त्री है न कोई बेटा।”
बाहर दालान में बैठी हुई रत्नावली सिर झुकाए सब चुपचाप सुन रही थी। एकाएक उठी और भीतर आ गई। तुलसीदास ने द्वार पर पत्नी को खड़े देखा। आँखों से आँखें मिलीं। कुछ क्षण बँधी रहीं।
फिर एकाएक तुलसी ने सिर झुकाकर रूखे स्वर में कहा—“यह तुमने उचित नहीं किया, रत्ना।”
“दुःख में उचित-अनुचित का ध्यान नहीं रह जाता। सहारा माँगने आई हूँ।”
“सहारा राम से माँगो।”
“मैं तुम्हारे हृदय में रमते हुए राम ही से सहारा लेने आई हूँ।”
तुलसीदास चुप, जिस दीवार पर राम लिखा था उसीसे सटकर खड़े हो गए। रत्नावली उनकी चौकी के पास आकर खड़ी हो गई थी। राजा उसके भीतर आते ही उठकर बाहर चले गए थे।
रत्ना ने रोते हुए कहा—“मेरा मुन्ना नहीं रहा, उसमें तुम्हें देख लेती थी, अब किसके सहारे जिऊँ?”
“सहारा केवल राम का है रत्ना।”
“मैं तुम्हारे जप-तप-ध्यान में तनिक भी बाधा न बनूँगी।”
“यह माना परन्तु नारी पुरुष के लिए प्रलोभन होती है।”
“मैं राम जी की सौंह खाती हूँ, तुम्हें किसी भी प्रकार से लुभाने का प्रयत्न नहीं करूँगी।
कहोगे तो मैं तुम्हारे सामने तक नहीं आऊँगी। मुझे केवल अपने पास रहने दो।
तुम निकट से अपने राम को निहारा करना, और मैं दूर से तुम्हें देखा करूँगी।” “बात कहने-सुनने में बड़ी अच्छी लगती है, किन्तु हवा रहेगी तो आग अपने-आप ही भड़केगी।” “मुझे तो अपने ऊपर विश्वास है। क्या तुम्हें अपने ऊपर विश्वास नहीं है?” “अब यह प्रश्न ही नहीं उठता देवी, जो त्याग चुका सो त्याग चुका।” “तुम्हारी झोली में यह खरी-कपूर, सब कुछ तो झलक रहा है। इनको अपनाओगे और पत्नी को त्यागोगे, क्या यह उचित है? अग्नि को साक्षी देकर विधिवत् तुमने जिसकी बाँह गही थी…” “उसी ने तो मेरी वह बाँह रामजी को पकड़ा दी। तुम्हारा आजीवन उपकार मानूँगा रत्नावली। जो दिया है उसे अब मुझसे वापस न माँगो। आज से यह चन्दन-कपूर आदि झोली का स्वांग भी छोड़ता हूँ। जितना निःसंग रह सकूँ उतना ही भला है।” रत्नावली सहसा उठकर उनके पास आ गई, उनकी टाँगों को अपनी बाँहों से बाँधकर, उनके चरणों पर अपना सिर रखकर वह बिलख-बिलखकर रोने लगी—“मुझे न त्यागो स्वामिन्। मुझे न त्यागो।” तुलसी अपने कलेजे में तूफान छिपाए पत्थर से खड़े रहे। मन कह रहा था—‘माया में न बँधना तुलसी। आज नहीं तो कल नारी का संग तुम्हें फिर से कामानुरक्त बना ही देगा। हे जानकी मैया, मेरी रक्षा करो। हे बजरंग, मेरी बाँह गहो, मुझे अब राम-पथ से विलग न करो।’ रत्नावली का करुण क्रन्दन और प्रलाप चलता रहा। तुलसी बोले—“मैं खड़े-खड़े थक गया हूँ, रत्नावली, मुझे बैठने दो।” रत्नावली ने धीरे-धीरे अपने हाथ सरका लिए। मुक्त होकर तुलसीदास ने डग आगे बढ़ाते हुए कहा—“तुम्हारे और अपने भोजन की व्यवस्था कर आऊँ। आता हूँ।” रत्नावली सहसा घबराकर बोली—“तुम जा रहे हो?” “आता हूँ।” कहकर तुलसीदास तेज़ी से द्वार के बाहर निकल गए। राजा भगत दालान में खड़े थे, तुलसी को देखकर पूछा—“कहाँ जा रहे हो भइया?” “फिर बताऊँगा।” कहकर तुलसी बिना रुके ही मुख्य द्वार की ओर तेज़ी से बढ़ गए और गली में निकलकर उन्होंने दौड़ना आरम्भ कर दिया। × × × “मैंने राम की ऐसी लगन साधी कि फिर जो कुछ भी राह में आया उसे हटाकर भाग चला।” बेनीमाधव जी ने उत्सुक होकर पूछा—“तो आपने चित्रकूट भी त्याग दिया?” “मेरे लिए वह अनिवार्य था।” “फिर कहाँ गए आप?” “सीता माई के माहरे, जगदम्बा के बिना मेरे मोहाकुल मन को और कौन शान्त कर सकता था?” बाबा अपनी कोठरी की दीवार पर चित्रित श्रीराम-जानकी की छवि को निहारने लगे। क्रमशः वे छवियाँ सजीव-सी हो उठीं। बाबा उन्हें देखते हुए गद्गद आनन्दलीन हो गए।” बेनीमाधव अपने गुरु की यह अपूर्व तेजोमयी छवि निहार रहे थे। उनका मन कह रहा था—‘राम यों मिलते हैं बेनीमाधव—यों मिलते हैं।’
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