स्वागतयोग्य निर्देश: दलबदल का मामला और सुप्रीम कोर्ट द्वारा महाराष्ट्र के विधानसभाध्यक्ष के लिए समयसीमा निर्धारित
दल-बदल के मामलों को विधानसभाध्यक्ष के दायरे से बाहर किया जाना चाहिए
विधानसभा के अध्यक्ष के लिए समयसीमा
सुप्रीम कोर्ट ने शिवसेना और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) के नेतृत्व से अलग हुए विधायकों को अयोग्य ठहराने की मांग वाली याचिकाओं पर फैसला करने के वास्ते महाराष्ट्र विधानसभा के अध्यक्ष के लिए समयसीमा निर्धारित कर दी है।
यह एक स्वागतयोग्य न्यायिक निर्देश का प्रतीक है। लंबा अनुभव यह दिखाता है कि अयोग्यता के मामले में विधानसभाध्यक्ष या तो बहुत ज्यादा मुस्तैदी या फिर निष्क्रिय उदासीनता के साथ पेश आते हैं, जो उनकी राजनीतिक संबद्धता पर निर्भर करता है।
तटस्थ रहने और संविधान की दसवीं अनुसूची (दलबदल-विरोधी कानून) से उपजे सवालों से निपटने में तात्कालिकता की भावना प्रदर्शित करने के अपने फर्ज की समय-समय पर याद दिलाए जाने के बावजूद, पीठासीन अधिकारी अपनी राजनीतिक वफादारी को अपने संवैधानिक फर्ज के ऊपर रखते नजर आते हैं।
इसलिए, यह बिल्कुल वाजिब है कि शीर्ष अदालत ने विधानसभाध्यक्ष राहुल नार्वेकर को मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के खेमे के खिलाफ अयोग्यता याचिकाओं पर 31 दिसंबर तक, और उप-मुख्यमंत्री अजित पवार की अगुवाई वाले एनसीपी-से- अलग-हुए समूह से जुड़ी याचिकाओं पर 31 जनवरी, 2024 तक फैसला लेने को कहा है।
ये निर्देश संविधान पीठ के 11 मई, 2023 के उस फैसले का स्वाभाविक अनुसरण हैं, जिसमें अयोग्यता के विषय पर विधानसभाध्यक्ष से ‘एक उचित अवधि के भीतर’ निर्णय करने को कहा गया था।
इतिहास
यह फैसला शिवसेना में टूट से उपजे एक मामले में आया था। इसी टूट के चलते सत्ता बदली थी और उद्धव ठाकरे की जगह शिंदे मुख्यमंत्री बने थे।
प्रक्रियात्मक पहलुओं और याचिकाओं को एकसाथ जोड़ने में कुछ देरी हुई हो सकती है, फिर भी इसमें कोई दो राय नहीं हो सकती कि विधानसभाध्यक्ष को इस मामले में फैसला लेने के लिए पर्याप्त समय मिला है।
सितंबर में इससे पहले के एक आदेश में, अदालत ने टिप्पणी की थी कि उसे उम्मीद है कि विधानसभाध्यक्ष उसके निर्देशों के प्रति सम्मान दिखायेंगे, खासकर जब वह दसवीं अनुसूची के तहत एक न्यायाधिकरण की तरह काम कर रहे हैं।
अगर न्यायिक आदेश न हों तो भी, किसी सदस्य की अयोग्यता का प्रश्न ऐसा मामला नहीं है जिससे सुस्त या पक्षपाती ढंग से पेश आया जा सके।
अन्य उदाहरण
हाल का राजनीतिक इतिहास कई राज्यों में सत्तारूढ़ दलों द्वारा, अयोग्यता के किसी डर के बिना, बेफिक्र होकर विपक्षी सदस्यों की भर्ती किये जाने के उदाहरणों से भरा पड़ा है, क्योंकि वे जानते हैं कि मित्रतापूर्ण विधानसभाध्यक्ष उन्हें अयोग्य नहीं ठहरायेंगे।
कर्नाटक के अयोग्यता मामले में अपने फैसले के आखिर में, अदालत ने टिप्पणी की थी कि ‘‘तटस्थ होने के अपने संवैधानिक फर्ज के खिलाफ काम करने की प्रवृत्ति विधानसभाध्यक्षों में बढ़ रही है’।
मणिपुर में, न्यायिक समयसीमा खत्म होने के काफी समय बाद भी, जब विधानसभाध्यक्ष यह फैसला करने में विफल रहे कि एक मंत्री को दलबदल के लिए अयोग्य ठहराया जाना चाहिए या नहीं, तब अदालत उस मंत्री को उनके पद से हटाने की हद तक चली गयी। जब तक अयोग्यता के विषयों पर फैसला करने का अधिकार स्पीकर के पास है, तब तक दलबदल के मामलों को राजनीतिक जंजाल से मुक्त करना कठिन होगा।
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